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बजरंग पुनिया ने PM को लौटाया पद्मश्री पुरस्कार, WFI अध्यक्ष के नए अध्यक्ष के खिलाफ है रेसलर

बजरंग पुनिया ने PM को लौटाया पद्मश्री पुरस्कार, WFI अध्यक्ष के नए अध्यक्ष के खिलाफ है रेसलर

बजरंग पुनिया ने PM को लौटाया पद्मश्री पुरस्कार, WFI अध्यक्ष के नए अध्यक्ष के खिलाफ है रेसलर
WFI के नए अध्यक्ष के खिलाफ बजरंग पुनिया (Bajrang Punia) ने सोशल मीडिया पर अपने पद्मश्री पुरस्कार को लौटाने का ऐलान किया।

भारतीय पहलवान बजरंग पुनिया ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया है कि वह अपने पद्मश्री पुरूस्कार को लौटा रहे हैं। वह पिछले दिनों WFI के पूर्व अध्यक्ष बृज भूषण के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। उनके हटने के बाद इस पद पर उनके ही करीबी ने चुनाव जीता, जिसके बाद एक बार फिर आंदोलन करने वाले पहलवान नाराज हैं।

बजरंग पुनिया ने सोशल मीडिया पर एक नोट शेयर करते हुए ऐलान किया कि वह अपने पद्मश्री अवार्ड को वापस कर रहे हैं। उन्होंने कैप्शन में लिखा, ” मैं अपना पद्मश्री पुरस्कार प्रधानमंत्री जी को वापस लौटा रहा हूँ. कहने के लिए बस मेरा यह पत्र है. यही मेरी स्टेटमेंट है।

इससे पहले गुरुवार को साक्षी मलिक के साथ वह प्रेस कांफ्रेंस में थे, जहां साक्षी मालिक ने कहा था कि अगर बृजभूषण के करीबी WFI के अध्यक्ष बनते हैं तो वह रेसलिंग छोड़ रही हैं।

बजरंग पुनिया ने प्रधानमंत्री को लिखा नोट सोशल मीडिया पर शेयर किया। उसमे उन्होंने लिखा, “उम्मीद है कि आप स्वस्थ होंगे। आप देश की सेवा में व्यस्त होंगे। आपकी इस भारी व्यस्तता के बीच आपका ध्यान हमारी कुश्ती पर दिलवाना चाहता हूं। आपको पता होगा कि इसी साल जनवरी महीने में देश की महिला पहलवानों ने कुश्ती संघ पर काबिज बृजभूषण सिंह पर सेक्सुएल हरासमैंट के गंभीर आरोप लगाए थे, जब उन महिला पहलवानों ने अपना आंदोलन शुरू किया तो मैं भी उसमें शामिल हो गया था। आंदोलित पहलवान जनवरी में अपने घर लौट गए, जब उन्हें सरकार ने ठोस कार्रवाई की बात कही। लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी जब बृजभूषण पर एफआईआर तक नहीं की पर उतरकर आंदोलन किया ताकि दिल्ली पुलिस कम से कम तब हम पहलवानों ने अप्रैल महीने में दोबारा सड़कों बृजभूषण सिंह पर एफआईआर दर्ज करे, लेकिन फिर भी बात नहीं बनी तो हमें कोर्ट में जाकर एफआईआर दर्ज करवानी पड़ी। जनवरी में शिकायतकर्ता महिला पहलवानों की गिनती 19 थी जो अप्रैल तक आते आते 7 रह गई थी, यानी इन तीन महीनों में अपनी ताकत के दम पर बृजभूषण सिंह ने 12 महिला पहलवानों को अपने न्याय की लड़ाई में पीछे हटा दिया था। आंदोलन दिनों में एक महिला पहलवान और पीछे हट गईं। हम सबपर बहुत दबाव आ रहा था।”

“हमारे प्रदर्शन स्थल को तहस नहस कर दिया गया और हमें दिल्ली से बाहर खदेड़ दिया गया और हमारे प्रदर्शन 40 दिन चला। इन 40 करने पर रोक लगा दी। आया कि हम क्या करें। इसलिए हमने अपने मेडल गंगा में बहाने की सोची। जब हम वहां गए तो हमारे कोच साहिबान और किसानों जब ऐसा हुआ ने हमें ऐसा नहीं करने दिया। उसी समय आपके एक जिम्मेदार मंत्री का हमें फोन आया और हमें कहा गया कि हम वापस आ जाएं। हमारे कुछ समझ नहीं साथ न्याय होगा।”

“इसी बीच हमारे गृहमंत्री जी से भी हमारी मुलाक़ात हुई, जिसमें उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि वे महिला पहलवानों के लिए न्याय में उनका साथ देंगे और कुश्ती फेडरेशन से बृजभूषण, उसके परिवार और उसके गुर्गों को बाहर करेंगे। हमने उनकी बात मानकर सड़कों से अपना आंदोलन समाप्त कर दिया क्योंकि कुश्ती संघ का हल सरकार कर देगी और न्याय की लड़ाई न्यायालय में लड़ी जाएगी, ये दो बातें हमें तर्कसंगत लगी।”

“लेकिन बीती 21 दिसंबर को हुए कुश्ती संघ के चुनाव में बृजभूषण एक बार दोबारा काबिज हो गया है। उसने स्टेटमैंट दी कि दबदबा है और दबदबा रहेगा। महिला पहलवानों के यौन शोषण का आरोपी सरेआम दोबारा कुश्ती का प्रबंधन करने वाली इकाई पर अपना दबदबा होने का दावा कर रहा था। इसी मानसिक दबाव में आकर ओलंपिक पदक विजेता एकमात्र महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कुश्ती से सन्यास ले लिया।”

हम सभी की रात रोते हुए निकली. समझ नहीं आ रहा था कि कहां जाएं, क्या करें और कैसे जीएं। इतना मान-सम्मान दिया सरकार ने, लोगों ने। क्या इसी सम्मान के बोझ तले दबकर घुटता रहूँ। साल 2019 में मुझे पद्मश्री से नवाजा गया. खेल रत्न और अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। जब ये सम्मान मिले तो मैं बहुत खुश हुआ. लगा था कि जीवन सफल हो गया। लेकिन आज उससे कहीं ज्यादा दुखी हूं और ये सम्मान मुझे कचोट रहे हैं। कारण सिर्फ एक ही है, जिस कुश्ती के लिए ये सम्मान मिले उसमें हमारी साथी महिला पहलवानों को अपनी सुरक्षा के लिए कुश्ती तक छोड़नी पड़ रही है।”

“खेल हमारी महिला खिलाड़ियों के जीवन में जबरदस्त बदलाव लेकर आए थे। पहले देहात में यह कल्पना नहीं कर सकता था कि देहाती मैदानों में लड़के-लड़कियां एक साथ खेलते दिखेंगे। लेकिन पहली पीढी की महिला खिलाड़ियों की हिम्मत के कारण ऐसा हो सका। हर गांव में आपको लड़कियां खेलती दिख जाएंगी और वे खेलने के लिए देश विदेश तक जा रही हैं। लेकिन जिनका दबदबा कायम हुआ है या रहेगा, उनकी परछाई तक महिला खिलाड़ियों को डराती है और अब तो वे पूरी तरह दोबारा काबिज हो गए हैं, उनके गले में फूल-मालाओं वाली फोटो आप तक पहुंची होगी। जिन बेटियों को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की ब्रांड अंबेसडर बनना था उनको इस हाल में पहुंचा दिया गया कि उनको अपने खेल से ही पीछे हटना पड़ा। हम “सम्मानित” पहलवान कुछ नहीं कर सके। महिला पहलवानों को अपमानित किए जाने के बाद मैं “सम्मानित” बनकर अपनी जिंदगी नहीं जी पाउंगा. ऐसी जिंदगी कचोटेगी ताउम्र मुझे। इसलिए ये “सम्मान” मैं आपको लौटा रहा हूं।”

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